दुनिया के मेले में तलाशिये

Saturday 21 November 2009


मेरी दिल्ली यात्रा: सूचना मिलते ही मुरैना स्टेशन पर पहुँचे भुवनेश शर्मा जी

पिछले माह, अक्टूबर की 11 तारीख को आधी रात बीत रही थी। अजय कुमार झा चैट पर बतिया रहे थे। एकाएक उनकी ओर से लिखा हुआ आया '... सोच रहा हूं आप लोगों से मिलने आ जाउं... शायद इसी साल आपकी हमारी मुलाकात हो जाये...बिल्कुल आमने सामने... शायद दिसम्बर में'। तब तक वर्षों से मेरी भी एक दबी हुई इच्छा जोर मारने लगी थी। मैंने लिखा '14 नवंबर का ट्रेड फेयर अटेंड किए कई वर्ष हो गए... इस बार सोच रहा हूँ कि... प्रगति मैदान की प्रगति देख ही लें ...'। अजय जी ने तुरंत लपक लिया 'बस बस तो सोचिये मत फ़ाईनल कर ही दिजीये...'


फिर क्या था! दूसरे ही दिन IRCTC की वेबसाईट पर ट्रेन का आरक्षण करवाया गया। 12 नवम्बर को दिल्ली के लिए रवानगी। 16 नवम्बर को दिल्ली से वापसी। अजय झा को बता भी दिया गया कि 13 नवम्बर की शाम पौने आठ से 16 की दोपहर साढ़े तीन तक दिल्ली की हवा खांएंगे! बाद में आरक्षण की अनिश्चित स्थिति को देखते हुए यह तारीख 17 नवम्बर हो गई।

दुर्ग स्टेशन से शाम 5:10 पर चली छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस दूसरे दिन सुबह सुबह भोपाल पहुँची। तो घने कोहरे ने हमारा स्वागत किया। प्लेटफॉर्म पर टहलते हुए याद आया कि यह तो शब्दों का सफर वाले अजित वड़नेरकर जी का शहर है। बिना कुछ सोचे-समझे उनके मोबाईल की घंटी बजा दी गई। जब कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला तो महसूस हुआ कि रात भर भास्कर समाचारपत्र में समाचार संपादक की जिम्मेदारी के बाद यह तो शायद उनके सोने का समय होगा अभी!

मैंने कुछ समाचार पत्र लिए और अंदर आ कर अपनी साईड सिंगल सीट पर बैठ गया। सामने बैठा युवक आता हूँ कह कर कहीं चले गया। मैंने भी टाँगे सीधी करने की नीयत से, तसल्ली से अपने पैर सामने वाली सीट पर V का चिन्ह बनाते हुए रख दिए और समाचारों पर निगाह दौड़ाने लगा। कुछ ही पलों बाद हॉर्न बजा और ट्रेन ने झटका लेते जैसे ही चलना शुरू किया, मुझे लगा कि पहाड़ ही टूट पड़ा! सामने वाली सीट का पीठ टिकाने वाला भारी-भरकम हिस्सा, मेरे पैरों पर आ गिरा था, ऐन दोनों अँगूठों के ऊपर!! उधर उसका मेरे दोनों पैरों को छूना हुया, इधर मेरी आँखों से दो आँसू टपक पड़े। कुछ मिनटों बाद तो बंद आँखें महसूस कर रही थीं कि मेरे दोनों अंगूठे किसी वाहन के ऊपर लगी लाल-पीली बत्ती जैसे लपलपा रहे हैं।

ट्रेन, झांसी पार कर चुकी थी कि द्विवेदी जी ने मोबाईल पर सम्पर्क किया। सुबह हिन्दी पन्ना वाले भुवनेश शर्मा जी से हुई बातचीत में, द्विवेदी जी ने मेरी यात्रा के बारे में सूचना दी है तथा भुवनेश जी शायद स्टेशन पर मुलाकात के लिए पहुँचें। ग्वालियर के आसपास भुवनेश जी ने सम्पर्क कर बताया कि वे अदालत में किसी मुकद्दमे की कार्यवाही में व्यस्त हैं, समय मिल पाया तो मुरैना स्टेशन पर मुलाकात के लिए आ पाएँगे। सीट नम्बर आदि की जानकारी चाहे जाने पर मैंने उन्हें संबंधित जानकारी एसएमएस से दे दी। बानमोर के पहले ही उनका फोन आ गया कि वे आ रहें हैं स्टेशन पर!

कानून की डिग्री लिए भुवनेश शर्मा जी से मेरा परिचय पिछले वर्ष हुया था। मेरी रूचि और उनकी आजीविका का क्षेत्र एक जैसा होने के कारण चैट, फोन पर अक्सर ही लम्बी बातें होती रहीं हैं। गूगल एडसेंस के बारे में भी हममें खूब विमर्श होता रहा है।

इसी वर्ष, फरवरी में जब अरूण अरोरा 'पंगेबाज' तथा कमलेश मदान जी ने ग्वालियर जाते हुए कुछ समय के लिए भुवनेश जी के घर पर बैठक जमाई थी तो भुवनेश जी का ही कहना था कि हिंदी ब्‍लागरी भी वाकई कमाल की चीज है... हमें तो यही आश्‍चर्य होता है कि हम जैसे अदने लोगों से भी लोग इतनी दूर से मिलने चले आते हैं...फोन-वोन पूछ-पाछ कर! और आज वही भुवनेश जी मुझ जैसे अदने से व्यक्ति से मिलने के लिए दौड़े चले आ रहे थे।

मुरैना स्टेशन पर ट्रेन का ठहराव मात्र 1 मिनट का था। मैं दरवाज़े पर आ कर खड़ा हो गया। ट्रेन रूकते ही झट से नीचे उतर निगाहें दौड़ाईं तो सामने ही नज़र आ गए भुवनेश शर्मा। गर्मजोशी से गले मिलने के बाद उन्होंने अपने साथ आए तिवारी जी का परिचय करवाया। हमने झट से तिवारी जी को आपना कैमरा पकड़ा दिया और दोनों की फोटो ले लेने का निवेदन किया। भुवनेश जी ने कुछ सकुचाते हुए से एक डब्बा बढ़ाया कि यह मुरैना की मशहूर गज़क आपके लिए। औपचारिक ना-नुकर के बाद जो परिणाम होना था, उसमें समय क्यों नष्ट किया जाए? सोच कर हमने वह प्रेम भरी भेंट झपट ली और खड़े हो गए उनके साथ, फोटो खिंचाने के लिए।

कथित आभासी दुनिया के चरित्रों को साक्षात् सामने देख कर निहारने का समय ही नहीं मिला। ट्रेन खिसकनी शुरू हो गई तो हम वापस लपके अपने डिब्बे की ओर। दरवाज़े पर खड़े हो विदा लेते पता नहीं क्यों आँखें नम हो आईं।

आगरा तक पहुँचते हुए ट्रेन लगभग डेढ़ घंटे की देर कर चुकी थी। अब तो बस इंतज़ार था दिल्ली के निज़ामुद्दीन स्टेशन के आने का।

आपको इंतज़ार करना होगा अगली पोस्ट के आने का!

20 टिप्पणियाँ:

शिवम् मिश्रा November 21, 2009 1:32 PM  

सच कहा आपने हम लोग कब इस इन्टरनेट से निकल कर एक दुसरे के जीवन में आ गए पता ही नहीं चला और अब यह आलम है कि एक दुसरे के बिना, भले ही इस इन्टरनेट के जरिये ही सही, काम ही नहीं चलता ! और जब जब आमने सामने मिलने का मौका मिलता है कोशिश यही रहेती है कि मौका जाने न पाए !

वैसे, यह भी एक कटु सत्य है कि हम लाख चाहते हुए भी अब कि बार दिल्ली न आ पाए !
खैर, मौके और भी आयेगे !

Nirmla Kapila November 21, 2009 2:31 PM  

बधाईयाँ पावला जी यूँ ही बढता फूलता रहे ये परिवार धन्यवाद्

काजल कुमार Kajal Kumar November 21, 2009 3:06 PM  

आपके दिल्ली आगमन पर बधाई.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi November 21, 2009 4:23 PM  

चलिए आप का दिल्ली सफर आरंभ हुआ। अब पैरों की उंगलियाँ कैसी हैं?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक November 21, 2009 5:57 PM  

यात्रा वृत्तान्त बहुत बढ़िया और प्रेरक रहा!

आपसे मुरैना स्टेशन पर मिलने पहुँचे
भुवनेश शर्मा जी ही थे ना?
:)

राज भाटिय़ा November 21, 2009 6:10 PM  

मेने इस लाईन को जिस मै पैरो की उंगलियो का जिक्र है कई बार पढा, ओर हेरान हुं कोई पूछने वाला नही आया, कसूर तो रेलवे का ही है, बाकी आप की यात्रा बहुत अच्छी लगी, ओर भुवनेश शर्मा जी से भेंट तो बहुत प्यारी लगी, बहुत अच्छा लगा अपना यह ब्लांगर परिवार, बिन देखे सब एक दुसरे को कितना जानने लग गये है,मै शिवन मिश्रा जी की बात से सहमत हुं.
धन्यवाद, पेर तो अब ठीक हो गया होगा.

vinay November 21, 2009 6:14 PM  

श्रीमति जी को मलेरिया होने के कारण आप से मिलने की हसरत दिल में ही रह गयी ।

Arvind Mishra November 21, 2009 6:45 PM  

आप भाग्य शाली है -यह क्या महज संयोग है की हम दोनों ही रेल यत्र संस्मरण लिख रहे हैं ?
http://mishraarvind.blogspot.com/2009/11/blog-post_21.html

Suresh Chiplunkar November 21, 2009 7:01 PM  

भुवनेश जी से मेरी दो बार मुलाकात हो चुकी है, ग्वालियर में छोटा भाई है उसके यहाँ जाने पर भुवनेश जी को पहले से बता देता हूं…। आपसे मिलने वे स्टेशन तक आये, मुझसे मिलने वे मुरैना से ग्वालियर आ जाते हैं…ऐसा प्रेम है उनका। उर्जावान और संस्कारी टाइप की "विलुप्त प्रजाति" के युवा हैं… उनसे मिलकर हमेशा अच्छा लगता है…

ज्ञानदत्त G.D. Pandey November 21, 2009 8:24 PM  

वाह! मुरैना तो मेरे जोन का स्टेशन है। भुवनेश जी की गजक लेने जाना पड़ेगा वहां।
पर हमें देंगे भी या नहीं?!

राजीव तनेजा November 21, 2009 8:50 PM  

अरे...आपने बताया ही नहीं कि आपको चोट लगी हुई थी...
मकड़जाल की आभासी दुनिया में रहते हुए भी एक अटूट रिश्ता सा कायम हो जाता है...

भुवनेश शर्मा November 21, 2009 9:24 PM  

आपके पैरों में लगी चोट के बारे में बताया नहीं आपने...अब कैसे हैं ?
ज्ञानदत्‍तजी आपका स्‍वागत है यहां...बाकी गजक तो आप कहें उस ट्रेन पर रखवा दूं, आपके पास पहुंचा ही देगा रेलवे :)

अनूप शुक्ल November 21, 2009 9:44 PM  

भुवनेश तो लिखना बंद करके कुछ ज्यादा स्मार्ट लगने लगे हैं भाई!

अजय कुमार झा November 21, 2009 9:49 PM  

ओह मैं समझ रहा था कि ट्रेन लेट थी तभी आपको देर हो गई .....मगर अब पता चला आपके खुद के पहियों में ही पंक्चर हो गया था ...चलिये अब अगली पोस्ट में घर पहुंचिये ..फ़िर मुलाकात होती है ....

शरद कोकास November 22, 2009 12:10 AM  

सुनने से ज़्यादा मज़ा यहाँ पढ़ने में आता है .. आपके साथ भोपाल का घना कोहरा देखा तो भोपाल मे अपने छात्र जीवन के दिन याद आ गये जब ऐसे ही कोहरे मे छत्तीसगढ़ एक्स्प्रेस से उतरकर हॉस्टेल जाते थे । आप धन्य हुए जो अजित वडनेरकर जी के मोबाइल की घंटी बज गई वरना रोज 11 बजे तक उनका ( मतलब मोबाइल का ) स्विच ऑफ रहता है । मुरैना स्टेशन पर आप इतने लम्बे सफर और अंगूठे मे चोट के बावजूद एकदम फ्रेश नज़र आ रहे हैं यह है आत्मीयता का कमाल । गजक तो खैर दिल्ली मे खत्म हो गई होगी वरना ...। खैर ..आगे के यात्रा वृतांत की प्रतीक्षा है ।

खुशदीप सहगल November 22, 2009 7:10 AM  

ब्लॉगिंग का गांधी ट्रेन पर सफ़र करें और भक्त मिलने न आएं..ऐंज सा़डे भारत विच नईं होंदा...

जय हिंद...

Anil Pusadkar November 22, 2009 9:47 AM  

इसिलिये कहते है फ़टे मे टांग नही अड़ाते,संभाल कर रखनी चाहिये और पांव हमेशा चादर देख कर पसारने चाहिये।देख लिया ना नतीज़ा।बढिया मज़ा लिया पाब्ला जी अकेले-अकेले।हम तो बस नही जा पाने का अफ़सोस ही कर सकते हैं।

anitakumar November 22, 2009 11:36 AM  

पैर कैसे हैं अब? भुवनेश जी के बारे में जान कर अच्छा लगा। हाँ आप ने सच कहा हिन्दी ब्लोगजगत से जुड़े लोग कब कंप्युटर की स्क्रीन से निकल कर हमारी जिन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं पता ही नहीं चलता। आगे की प्रगती सुनने का इंतजार है…:)

बी एस पाबला November 22, 2009 4:26 PM  

हे राम!
ब्लॉगिंग का गांधी !!!

खुशदीप जी, कुछ रहम कीजिए। मैं तो कराह भी नहीं पा रहा।
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पैरों की चोट अभी भी दर्द दे रही, सोच रहा हूँ कल जा कर एक्सरे करवा ही लिया जाए।

Vivek Rastogi November 23, 2009 7:21 AM  

वाकई कब हम एक परिवार में प्रवेश कर गये हमें पता ही न चला। हमें भी गजक चाहिये । :)

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